शैशवावस्था में शिक्षा (Shaishavaavastha Mein shiksha)

इस विषय में जानकारी शैशवावस्था में शिक्षा (Shaishavaavastha Mein Shiksha) के बारे दी गई है । आशा करता हूं कि यह लेख आपको पसन्द आयेगा और इस लेख को पढ़कर आप समझ पायेंगे।

शैशवावस्था में शिक्षा (Infancy In education)

शैशवावस्था शिक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवस्था होती है । इस अवस्था में बालक सर्वाधिक अधिगम प्राप्त करता है तथा इस अवस्था में ऐसी शिक्षा होनी चाहिए जिससे शिशु का सर्वांगीण विकास हो सके । इस अवस्था में शिक्षा की व्यवस्था करते समय निम्नलिखित बातें होने चाहिए ; 

( 1 ). उपयुक्त वातावरण

शिशु का विकास उपयुक्त वातावरण में ही संभव हो पाता है । अतः उसके शैक्षिक विकास हेतु घर एवं विद्यालय दोनों जगह अच्छे एवं उपयुक्त वातावरण के निर्माण का प्रयास करना चाहिए ।

( 2 ). उचित व्यवहार

शैशवावस्था में बालक का शरीर एवं मन कोमल एवं लचीला होता है । अतः उनका पालन – पोषण में माता – पिता एवं अभिभावकों को बहुत सावधानी रखने की आवश्यकता होती है । ऐसे समय में उनके साथ यदि व्यवहार प्रेमपूर्ण नहीं रहता है तो उसके विकास में बाधा उत्पन्न होती है । डाँटना , मारना , पीटना , भय या क्रोध दिखाने आदि से उसका विकास अवरुद्ध हो सकता है ।

( 3 ). उचित पोषण

शिशु के शारीरिक विकास के लिए उचित स्वास्थ्यवर्धक भोजन की व्यवस्था होनी चाहिए । संतुलित भोजन से बालक का शारीरिक विकास उत्तम प्रकार से होता है । अतः इन बातों का अभिभावकों एवं अध्यापकों को विशेष ध्यान रखना चाहिए ।

( 4 ). जिज्ञासा की संतुष्टि

इस अवस्था में शिशु की ज्ञानेंद्रियों के द्वारा विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त होने लगते हैं । इस माध्यम से वह विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के संबंध में प्रश्नों के माध्यम से अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने लगता है । अतः इस अवस्था में माता – पिता एवं शिक्षकों को बालक के प्रश्नों का समुचित उत्तर देकर उसकी जिज्ञासा का समाधान करना चाहिए ।

( 5 ). मूल प्रवृत्तियों का प्रोत्साहन

शिशु के व्यवहार का आधार उसकी मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं । इन प्रवृत्तियों का दमन होने के कारण शिशु का विकास अवरुद्ध हो जाता है । इसलिए उन्हें शिक्षा प्रदान करते समय शिक्षकों एवं अभिभावकों को इसका ध्यान रखना चाहिए ।

( 6 ). आत्मनिर्भरता की शिक्षा

शैशवावस्था में शिशु को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उसे अपना कार्य स्वतंत्रतापूर्वक करने देना चाहिए तथा शिक्षक द्वारा उसमें आत्म – विश्वास की भावना विकसित की जानी चाहिए ।

( 7 ). आत्म – प्रदर्शन के अवसर

छोटे बालकों में आत्म प्रदर्शन की भावना प्रबल होती है । अध्यापकों एवं अभिभावकों को बच्चों की इस भावना को प्रोत्साहित चाहिए और उन्हें इसके प्रदर्शन के लिए उचित अवसर प्रदान करने चाहिए ।

( 8 ). खेल द्वारा शिक्षा

शिशु को खेल में जन्म से ही रुचि होती है । यह शिशु की सक्रियता का प्रमुख आधार होता है । अतः शिशु को खेल के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए जिससे वह खेल – खेल में ही शिक्षा में रुचि ले सके ।

( 9 ). खेल एवं क्रिया द्वारा शिक्षा

शिशु बहुत अधिक क्रियाशील होता है इसलिए इस अवस्था में शिशु को पहले अकेले खेलने और फिर दूसरों के साथ खेलने के अधिक अवसर दिए जाने चाहिए ।

( 10 ). मानसिक क्रियाओं के अवसर

शैशवावस्था में मानसिक क्रियाशीलता बहुत तीव्र होती है । अतः अध्यापकों एवं अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों को ध्यान , तर्क , चिंतन , कल्पना आदि मानसिक क्रियाओं के लिए उचित अवसर प्रदान करें ।

( 11 ). मानसिक विकास हेतु अवसर

शैशवावस्था के प्रारंभ में शिशु एकांतप्रिय होता है । सामाजिक आदर्शों एवं मूल्यों का ज्ञान प्रदान करके उसके व्यवहार को सामाजिक बनाया जाता है । अतः इस अवस्था में इस प्रकार की शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए जो सामाजीकरण में शिशु का मार्गदर्शन कर सके ।

( 12 ). अच्छी आदतों का निर्माण

शैशवावस्था में शिशु को इस प्रकार की शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए जिससे उसमें अच्छी आदतों का निर्माण हो सके तथा समय पर उठना , खाना , सोना , शरीर की स्वच्छता इत्यादि । कला वैयक्तिक विभिन्नता पर उचित ध्यान घर एवं विद्यालय में बच्चों को उनकी रुचि , अभिरुचि , अभिक्षमता , बुद्धि आदि को ध्यान में रखकर उनके लिए उचित शिक्षा व्यवस्था करनी चाहिए ।

तो दोस्तों मुझे उम्मीद है कि इस लेख में दी गई सभी जानकारी को अच्छी तरह समझ गए होंगे । अगर आपका कोई सवाल या सुझाव है तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं. [धन्यवाद] 

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